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नई भोर, नई चाल

भोर हुई, भोर हुई,   घड़ियों की घूमी सुई।   चहुँ ओर शोर हुई,   भोर हुई, भोर हुई।   तुम भी तो इन सबका एक अंग हो,   फिर क्यों इतने दंग हो?   चलो जहाँ ले चलें हवाएँ,   तुम भी तो इनके संग हो। नया ये जो आरंभ है,   जो अति विशेष ये प्रारंभ है।   उम्मीदें हैं, आशाएँ हैं, आकांक्षाएँ हैं,   फिर क्यों लगते तुम्हें ये इतने पराए हैं? चाल धीमी हुई तो क्या हुआ,   पर चलो तो सही।   जीत हो या हार हो,   पहले लड़ो तो सही।   चाहे विचारों का उन्माद हो,   या बीते हुए कल का अवसाद हो,   कर दरकिनार सबको पहल करो,   जो कर सको सही सब, तो सब करो। न सोचना कि परिणाम क्या होगा,   न सोचना कि अंजाम क्या होगा।   हुई भोर ऐसी, तो शाम क्या होगा...                           अभिषेक सेंगर

विजय पथ की ओर

रोना-धोना क्यों?   क्यों ये मातम?   क्यों ये शोक?   पा लो जो तुम पाना चाहो,   कौन रहा है तुम्हें रोक? बल-बुद्धि जो सब है तुममें,   तुम उनका संधान करो।   केवल बाधाएँ ही नहीं पथ पर,   हंसी-ठिठोली अपनेपन का भी पान करो। कदम तुम्हारे ऐसे हों,   महाभारत के भीमसेन के जैसे हों।   जहाँ धरो हुंकार हो,   सत्कर्मों की जय-जयकार हो। जब समय उचित हो,   उद्देश्य निहित हो।   हो समर्पित, तब सब कुछ ख़ुद का वार दो।   प्राप्ति नहीं होती फल की यूँ ही,   तुम विजय पथ को अपने कर्मों का आहार दो।                                अभिषेक सेंगर