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मैं घर हूँ

मैं घर हूँ मैंने सब देखा है। उस नन्ही-सी जान का आना भी, और उस बड़े से आसमान का जाना भी। कई अंजान चेहरों को अपना बनते देखा मैंने, कई अपनों को नज़रों से गिरते देखा मैंने। मैं घर हूँ, मैंने सब देखा है। कई पतझड़ देखे, कई बारिशें देखीं, कभी तूफ़ान से, तो कभी मुस्कान से सावन देखे। मैंने तुम्हारे जीवन का हर वसंत देखा है। मैं घर हूँ, मैंने सब देखा है। तुम्हारे जाने पर उन बुज़ुर्ग आँखों में आँसू देखे, तुम्हारे आने पर उन थके चेहरों पर मुस्कान देखी। सब कुछ देखता हूँ, पर कुछ बोलता नहीं। तुम सोचते हो कि मैं कुछ समझता नहीं, जड़ हूँ, पर बेजान नहीं। मैं घर हूँ, मैंने सब देखा है। तुम तो रोकर कर लेते हो दिल हल्का किसी के जाने पर, मैं तो उसका भी हक़दार नहीं। टूट जाऊँगा मैं भी एक दिन, इस समय की मार से। घर ही हूँ, कोई भगवान नहीं। तुम न कहना कुछ, मैं सब समझता हूँ। मैं घर हूँ, मैं सब जानता हूँ।

अजनबी राहों में दोस्ती का सफर

अनजान ही था ये शहर, जिसे कुछ गैरों ने अपना बना लिया। आए कई लम्हे ऐसे, जब उदासी छाई थी घर की याद में, पर फिर भी वो ना थे हमसे दूर, उन्होंने ही इन लम्हों को हँसकर जीना सिखा दिया। तवज्जो तो नहीं दी हमने कभी किसी बात को, फिर कैसे इन गैरों ने मुझे अपना बना लिया? ये भूल थी मेरी या मैं नासमझ था, ये तो पता नहीं, पर कुछ तो बात थी... जो इन्होंने इस ज़िंदगी के सफर में हमें अपना हमसफर बना लिया। यूँ तो कहने को हैं बातें हज़ार, पर वो अल्फाज़ नहीं। गीत हैं कई इस दिल में, पर उन्हें गा पाऊँ, वो साज़ नहीं।